Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 113, Verse 3
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 113, verse 3 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 113 · श्लोक 3
संस्कृत श्लोक
दूरात्तावदविच्छिन्नमनुसस्रुर्बलानि ते ।
यावत्तीरं समुद्राणां प्रवाहाः सरितामिव ॥ ३ ॥
हिन्दी अर्थ
दरददेश के योद्धा दर्दुर पर्वतपर आरपार रहित (असीम) गुफाओं के बिलं में
भय से विदीर्णहृदय होकर दानवो की भाँति विलीन हो गये