Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 115, Verse 35
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 115, verse 35 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 115 · श्लोक 35
संस्कृत श्लोक
नवरसासवसारनिशागमक्षयभयातुरचित्ततयाङ्गना ।
त्यजति कान्तमियं न मनागपि द्रुतमितो वलितेव पुरोऽहिभिः ॥ ३५ ॥
हिन्दी अर्थ
शबरियों के शरीरो में वस्त्रं की कल्पना द्वारा जीर्णशीर्ण पत्तों के ढेरवाले
मलयाचल पर्वतपर पत्ते पहननेवाले शबरों से तथा बाणो से पूर्ण अतएव थोड़े से अवशिष्ट मृगों
पक्षियों से युक्त मलयवनराजिर्यँ नगर-सी मालूम पडती हैं