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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 117, Verse 56

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 117, verse 56 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 117 · श्लोक 56

इस समूह का संस्कृत श्लोक-संरेखण अभी परिष्कृत किया जा रहा है; नीचे इसका हिन्दी अर्थ दिया गया है।

हिन्दी अर्थ

भोग-परम्पराओं मे संलग्न (विषयलम्पट) मूर्ख धतूरा खाने से उन्मत्त हुए, मदिरा आदि पीने से मदमत्त हुए, प्रमाद और क्रोधावेशादिवश कुएँ में गिरने के लिए उद्यत हुए, भूतावेश से इधर उधर दौड़ रहे तथा तत्वज्ञान के उत्कर्ष से देहादि के परिच्छेद की विस्मृतिवश "मैं ब्रह्म हूँ यों सर्वोत्कृष्ट प्रमा की प्रतिष्ठा होने से षष्ठ आदि भूमिका में आरुढ हुए पुरुषों को अपने में अभिज्ञता के आरोप से जो तृणतुल्य समझता है, हे तृणलवाग्र, उसे तुम्हीं देखो । यह इस विषयलम्पट पुरुष की इच्छासत्ता है या जडता है इस रहस्य का तुम्हीं विचार करो । यदि इच्छासत्ता है, तो वही कुत्तों के तुल्य है, यदि जडता है तो विषयलम्पटता आदि दोषों की अधिकता से वह स्वयं तृणलव से भी नीच है, अतः विचार करने पर उसकी तृण समानता भी दुर्लभ है, यह अर्थतः सिद्ध हो जायेगा । ऐसी अवस्था में उन्मत्त आदि से भी वह अधिक नीच है, इसमें कहना ही क्या है ?