Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 117, Verse 58
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 117, verse 58 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 117 · श्लोक 58
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हिन्दी अर्थ
हे नित्य अपवित्र, अपने प्रियजन
के प्रति हू-हू करने में प्रवीण, गली -कूच में घूमने मेँ सारा समय बितानेवाले अरे कुत्ते, मालूम होता
है जैसी मेरी चित्तवृत्ति है वैसी ही इसकी भी है यह देखकर तुम्हें अपने गुणों की शिक्षा का पात्र समझ
रहे किसी मूर्ख ने नित्य अशुचिता आदि अपने गुण तुम्हें सिखाये हैं | ऐसी परिस्थिति में शिष्य की
अपेक्षा गुरु में गुण की अधिकतादर्शन उपपन्न होता है