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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 117, Verse 59

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 117, verse 59 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 117 · श्लोक 59

इस समूह का संस्कृत श्लोक-संरेखण अभी परिष्कृत किया जा रहा है; नीचे इसका हिन्दी अर्थ दिया गया है।

हिन्दी अर्थ

कर्मो की विषमतावश अत्यन्त विषम जगत्‌ की रचना कर रहे विधाता ने अपने दौहित्र (सरमा नाम की देवशुनी के पुत्ररूप) इस कुत्ते में अनुरूप सब धर्मो के दर्शन के लिए वक्ष्यमाण सभी कुछ समान रूप से बना डाला । वह सब कुछ है, कूडे करकट के स्वनिर्मित गड में निवास, पुरीष ओर पीव भोजन, सड़क आदि खुली जगहों में चिरकाल तक ग्रन्थिरूप कुत्सित मैथुन में दुरिच्छा तथा सर्वनिन्दनीय शरीर