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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 117, Verse 68

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 117, verse 68 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 117 · श्लोक 68

इस समूह का संस्कृत श्लोक-संरेखण अभी परिष्कृत किया जा रहा है; नीचे इसका हिन्दी अर्थ दिया गया है।

हिन्दी अर्थ

वेग से उड़ रहे या कलियों के आस-पास मंडरा रहे सारसा द्वारा चटचट खिल रहे कमलों के मकरन्द से (पुष्परस से) मनोहर इस तालाब में कौआ कैसे क्रीडा करता है, जिसके कन्धे कूड करकट की उड़ रही धूलि से धुमैले हैं ? उसका यहो क्रीड़ा करना अनुचित है, यह भाव हैं