Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 117, Verse 75
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 117, verse 75 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 117 · श्लोक 75
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हिन्दी अर्थ
हे मधुरकण्ठ हे
कोयल, यहाँ पर कानों के लिए उत्सवरूप तुम्हारे कलरव को कौन सुनता है ? जो रतिरूपी विग्रह
का सन्धिदूत है । क्योकि यहाँ नीम के झुरमुट में उल्लुओं के साथ सदा कलह करनेवाले कौओं ने
काँव काँव के कोलाहल से सबके कान बहरे कर दिये हैं