Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 118, Verse 29
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 118, verse 29 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 118 · श्लोक 29
संस्कृत श्लोक
किमिदं नयथेति ततः पृष्टाभिस्ताभिरुक्तमेतस्य ।
व्यसनज्वरतप्तायाः पथिक वयं बालसख्य इति ॥ २९ ॥
हिन्दी अर्थ
अरे भ्रमर, तुम भाँति-भाँति के फलों
के रस चखते हुए सब पर्वतों के निकुंजों मे नित्य चक्कर लगाते हो, आज तक तुम्हे सन्तोष नहीं हुआ ?
पुष्परसलम्पट होने के कारण सचमुच तुम्हारा आशय शुद्ध नहीं है । मालुम पड़ता है, आज तक तुम्हें
वनों से सार प्राप्त नहीं हुआ । यदि सार वस्तु तुम्हें मिल जाती, तो तुममें असन्तोष न रहता और
तुम्हारे इस तरह भटकने की भी संभावना न रहती