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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 118, Verses 39–41

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 118, verses 39–41 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 118 · श्लोक 39-41

इस समूह का संस्कृत श्लोक-संरेखण अभी परिष्कृत किया जा रहा है; नीचे इसका हिन्दी अर्थ दिया गया है।

हिन्दी अर्थ

यह सरसी (तालाब) जैसे नारी नूपुरों से विराजमान होती है वैसे ही हंस के बच्चों से सुशोभित हो रही है । तरंग ही इसके कंकण हैं, चंचल जलकणराशि ही इसका हार है, कुई, नीलकमल, लालकमल आदि फूलों के संभार से यह सुन्दर है, भवर ही इसके चंचल कुन्तल हैं, कूज रहे सारस ही नूपुर हैं, गोल भवर ही नाभि है तथा चंचल तरंग ही नेत्र है, यह मनोरथ को पूर्ण करनेवाले (जल के प्रवाह को बढानेवाले) पर्वतरूपा पति को देख रही है