Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 119, Verse 7
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 119, verse 7 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 119 · श्लोक 7
संस्कृत श्लोक
इत्थं चिन्तापरवशमतेस्तन्वि सार्धं त्वयाऽसावन्तर्लीनप्रसरमनसः क्वापि याता स्मृतिर्मे ।
संपन्नोऽहं परवशवपुः काष्ठकुड्योपमाङ्गो भङ्गं सोढुं क इव विरहक्लेशजं नाम शक्तः ॥ ७ ॥
हिन्दी अर्थ
फथिक की क्री कमल तोड़नेवाली महिलाओ को देख रहे अपने पति के (पथिक के) प्रति
कहती हैं /
हे प्रियतम, इस जल में शीत को कुछ भी न गिननेवाली ग्रामीण स्त्रियों को देखो, ये सफेद
कमलों को ले जाती हैं । तुम इनका अनुगमन करना चाहते हो इसलिये मैं तुम्हारी प्रिया नहीं हूँ,
अतएव मैं जाती हूँ