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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 12, Verse 41

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 12, verse 41 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 12 · श्लोक 41

संस्कृत श्लोक

ब्रह्मेदं घनमजराद्यनन्तमेकं संकल्पस्फुरणमविद्यमानमेव । बुद्ध्वैवं व्यपगतमानमेयमोहो निर्वाणं परिविहरन्विशोकमास्स्व ॥ ४१ ॥

हिन्दी अर्थ

हे श्रीरामजी, यह परिशिष्टवस्तु, आनन्दैकघन, जरादिविकारशून्य अनन्त, एक ब्रह्म ही है । जीव ओर जगद्रूप तो विकल्प का स्फुरण होने से सर्वथा अविद्यमान ही है । इसलिए हे श्रीरामजी, आप अपने को परमात्मततत्वरूप जानकर प्रमाण, प्रमेय आदि त्रिपुटी के मोह से शून्य होते हुए ब्रह्म ही होकर के सर्वातिशायी बृहत्‌ होने से सब ओर से व्याप्त होकर विहार करते हुए शोकशून्यस्थित रहिये