Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 13, Verse 1
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 13, verse 1 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 13 · श्लोक 1
संस्कृत श्लोक
भुशुण्ड उवाच ।
जगत्प्रसररूपस्य न देश उपयुज्यते ।
न कालो धारणे स्तम्भ आलोकस्याम्बरे यथा ॥ १ ॥
हिन्दी अर्थ
देश कालादि निर्माणपूर्वक केदन विदुः ˆ इत्यादि जो पूर्व सर्य में कहा गया है, उसका उपपादन
करने के लिए उन््र-त्रसरेणु आख्यान कहने के पहले श्रमिक बधते है
भुशुण्डजी ने कहा : हे विद्याधर, इस मायिक विस्तृत जगद्रूप के धारण में देश और काल की
अपेक्षा इस तरह नहीं है, जिस तरह आकाश में फैले हुए प्रकाश के धारण में खम्भों की अपेक्षा नहीं
है
सर्ग सन्दर्भ
बारहवाँ सर्ग समाप्त तेरहवाँ सर्ग॑ माया के कार्य में देश आदि की अपेक्षा का अभाव तथा परमाणु के उदर में इन्द्र के राज्य की कल्पना का विस्तार-यह वर्णन |