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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 120, Verse 7

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 120, verse 7 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 120 · श्लोक 7

संस्कृत श्लोक

मधुरं वंशविश्रान्तो गातुमेष वनानिलः । प्रवृत्तः पाण्डुनगरनारीभिरिव शिक्षितः ॥ ७ ॥

हिन्दी अर्थ

हे कृशांगि, इस तरह मेघ से कहकर तुम्हारी चिन्ता से पराधीन बुद्धिवाले मेरे मन का व्यापार भीतर ही भीतर लीन हो गया, अतएव तुम्हारे ही साथ मेरी स्मृति (पूर्वपर के अनुसन्धान की शक्ति) भी गुम हो गई । तदुपरान्त स्मृतिनाश से मेरा शरीर बेकाबू हो गया और मेरे सव अवयव काष्ठलोष्ठ के समान निश्चेष्ट हो गये। भला वियोगदुःख से उत्पन्न पराभव को कौन सह सकता है ?