Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 120, Verse 8
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 120, verse 8 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 120 · श्लोक 8
संस्कृत श्लोक
निकारः कर्णिकारेण पवनस्य यदा कृतः ।
तदा परिहरन्त्येनं भ्रमरा अपि दूरतः ॥ ८ ॥
हिन्दी अर्थ
तदनन्तर मेरी वैसी अवस्था देखकर एकत्र हुए जनसमूह मे महा हाहाकार मचा
और देखने के लिये आ रही पथिक महिलाओं का भी छाती पीटना भूलकर अहा बेचारा पथिक मर
गया ऐसा कोलाहल हुआ । वहाँ पर किन्हीने दुःखभार से रुधे हुए स्वरवाले दीनतापूर्ण आलापों से
मेघ की निन्दा की