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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 121, Verses 30–31

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 121, verses 30–31 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 121 · श्लोक 30

इस समूह का संस्कृत श्लोक-संरेखण अभी परिष्कृत किया जा रहा है; नीचे इसका हिन्दी अर्थ दिया गया है।

हिन्दी अर्थ

सागर के तटवर्ती पर्वतो के, जिनके तट जलतरगों से धोये साफ सुथरे हैं, पाद (तलैटियाँ) समुद्रीय रत्नराशियों से नूपुरों के समान शोभित होते हैं और शब्द करते हैं