Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 122, Verse 15
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 122, verse 15 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 122 · श्लोक 15
संस्कृत श्लोक
महोर्मिमुक्तामाणिक्यमण्डलप्रतिबिम्बिताः ।
एकाकिनोऽपि परितः पौरुषेयवृता इव ॥ १५ ॥
हिन्दी अर्थ
योगियों के योगप्रभाव
से गम्य मार्ग में चल रहे हम लोगों की मृत्यु न हो, जिस मार्ग में देह का संभव नहीं यानी दक्षिणायन
तथा उत्तरायण मार्गरूप मर कर ही जाये, जा सकने योग्य पथ में हमारा मन ही गमन करे