Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 124, Verse 5
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 124, verse 5 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 124 · श्लोक 5
संस्कृत श्लोक
तेन यस्य यदा यद्यत्पुरो भवति वस्त्वसौ ।
यदर्थं युज्यते तेन चिद्धनैकस्वभावतः ॥ ५ ॥
हिन्दी अर्थ
दक्षिण दिगन्त को देखने के लिये प्रवृत्त विपश्चित्
को इक्षुरस सागर में स्थित दक्ष नगर में वशीकरणविद्या की शिक्षा में निपुण यक्षिणी ने देखकर अपने
विद्याबल से अपनी ओर आकृष्ट कर अपना प्रेमी बना लिया