Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 126, Verse 20
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 126, verse 20 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 126 · श्लोक 20
संस्कृत श्लोक
उत्तरस्तरलास्फालकल्लोले सप्तमाम्बुधौ ।
सहस्रमेकं वर्षाणामुवास मकरोदरे ॥ २० ॥
हिन्दी अर्थ
योगियों को ऐच्छिक अर्थक्रियासामर्थ्यरूप सिद्धि होने पर भी उपपत्ति कहते हैं।
किंचित् बोध को प्राप्त हुई संवित् की वह सिद्धता भी उचित ही है। कारण कि जैसे-जैसे बोध में
उत्कर्ष होता है वैसे-वैसे अकामहतत्त्वप्रयुक्त आनन्द के उत्कर्षं से होने वाले ऐश्वर्यप्रकर्षक्रम की भी
उपपत्ति होती है, यह भाव है । इस तरह सम्पूर्ण दिशाओं में स्थित वे (विपश्चित्) आपस में सब कुछ
देखते हैं, अनुभव करते हैं और शीघ्र विपत्तिरूपी रोग की चिकित्सा करते हैं