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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 126, Verse 22

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 126, verse 22 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 126 · श्लोक 22

संस्कृत श्लोक

ततोऽशीतिसहस्राणि योजनानां घनावनिम् । हिमकल्पजलाम्भोधेरुल्लङ्घ्य सुघनोदरीम् ॥ २२ ॥

हिन्दी अर्थ

विपश्चतों के प्रसंग में योगियों और ज्ञानियों की एक साथ सवर्थीक्रियोपपत्ति का वर्णन होने पर विपश्चित्‌ भी ज्ञानी थे, यों समझ रहे श्रीरामचन्द्रजी शंका करते हैं। श्रीरामचन्द्रजी ने कहा : हे मुनिश्रेष्ठ, यदि विपश्चित्‌ ज्ञानी थे, तो वे दिशाओं में सिंह, बैल आदि कैसे बने, कृपया मेरे बोध के लिए यह शीघ्र कहिये । भाव यह है कि ज्ञानी जन सरवार्थिक्रिया में स्वतन्त्र होते हैं, अत: विपश्चितों को परतन्त्रतावश होने वाले सिंह, बैल आदि के शरीररूप संकट प्राप्त नहीं हो सकते, अतः उन लोगों ने परस्पर एक दूसरे पर अनुग्रह किया, यह कथन असंगत है