Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 127, Verse 30
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 127, verse 30 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 127 · श्लोक 30
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हिन्दी अर्थ
हे श्रीरामचन्द्रजी, उस परिखा में भँवरे के समान, काजल के समान और तमाल के समान आकाश के
बीच में अन्धकार है। न पृथिवी है, न स्थावर जंगम प्राणी हैं और न आश्रय है। और न कभी किसी भी
वस्तु का सम्भव ही है, ऐसा आप समझिए