Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 128, Verse 17
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 128, verse 17 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 128 · श्लोक 17
संस्कृत श्लोक
स्वभ्यस्तपूर्वसंस्कारो विलसन्निश्चयेरितः ।
लोकालोकगिरेर्मूर्घ्नस्तमःश्वभ्रं पपात सः ॥ १७ ॥
हिन्दी अर्थ
आकाश से नक्षत्रमण्डल का अन्तर्दलविस्तार दुगुना है दिशाओं में घुमने की स्थिति बेल के छिलके के
समान है