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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 128, Verse 18

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 128, verse 18 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 128 · श्लोक 18

संस्कृत श्लोक

ददर्श तत्र शिखरप्रतिमैर्विहगैर्वपुः । विकर्तितं मनोदेहं प्रसृतं च स्वचिन्तिते ॥ १८ ॥

हिन्दी अर्थ

शबल ब्रह्म का सत्य संकल्पात्मक जिस प्रकार का कथन है, वही इस प्रकार के संनिवेश से यानी ब्रह्माण्ड और उसके अवयवरूप से जगत्‌ की स्थिति है