Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 128, Verse 2
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 128, verse 2 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 128 · श्लोक 2
संस्कृत श्लोक
एतदस्मज्जगत्स्वप्ने नान्येषु कथितं मया ।
अन्येष्वस्ति जगत्स्वप्नेष्वेवमन्यापि च स्थितिः ॥ २ ॥
हिन्दी अर्थ
श्रीवसिष्ठजी ने कहा : वत्स श्रीरामजी, जैसे बालक
के संकल्प से परिकल्पित कन्दुक (गेंद) आकाश में रहता है वैसे ही हिरण्यगर्भरूपी बालक द्वारा
परिकल्पित भूमि भी आकाश में टिकती हे, गिरती नहीं है