Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 128, Verse 3
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 128, verse 3 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 128 · श्लोक 3
संस्कृत श्लोक
जगत्स्वप्नेषु चान्येषु संस्थानकथनेन किम् ।
न ह्यौपयोगिकादन्या कथा भवति धीमताम् ॥ ३ ॥
हिन्दी अर्थ
अथवा मिथ्या होने से ही उसके पतन की शका नहीं है, ऐसा कहते है।
जैसे तिमिररोग से पीडित नेत्रवाले रोगी को आकाश में केशचन्द्र आदि का (केशों के गोलो का-
सा) दर्शन होता हे वैसे ही चिदाकाश को सृष्टि के आदि मेँ पृथिवी आदि का दर्शन होता है