Guru's AddaGuru's Adda

Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 128, Verse 5

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 128, verse 5 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 128 · श्लोक 5

संस्कृत श्लोक

प्रत्यक्षमेतदन्येषां यत्र तेऽन्ये जगद्भ्रमाः । नास्माकं विषये ते हि तथा संस्थानशोभिनः ॥ ५ ॥

हिन्दी अर्थ

अथवा सब वस्तुओं के स्वभाव की सिद्धि चित्‌ के अधीन है किसी से धारण न की गई गोल आकारवाली भूमि का, जो चित्‌ से सिद्ध है, वैसे ही स्वभाव का अनुमान करना चाहिये, इस आशय से कहते हैं। चित्‌ होने से स्वभावतः चित्‌ में जिस वस्तु का जिस प्रकार से जबतक भान होता है सर्वत्र उस वस्तु का उस प्रकार का स्वभाव उतने समय तक प्रतीत होता है