Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 13, Verses 3–4
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 13, verses 3–4 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 13 · श्लोक 3,4
संस्कृत श्लोक
चिच्चमत्कृतिमात्रस्य साधो जगदणोः किल ।
वातान्तः सौरभं मेरुरन्यानुभवयोगतः ॥ ३ ॥
यं प्रत्युदेति सर्गोयं स एवैनं हि चेतति ।
पदार्थः संनिवेशं स्वमिव स्वप्नं पुमानिव ॥ ४ ॥
हिन्दी अर्थ
हे साधो, चिति के चमत्कारमात्ररूप से दृढ़ इस
जगद्गूपी अणु की अपेक्षा वायु के अन्तर्गत सौरभ भी मेरु की नाई स्थूल है, इसमें तनिक भी सन्देह
(&) अर्थक्रियाव्यवहार के योग्य न रहने से वह “असत्” तथा अबाध्य परम पुरुषार्थरूप होने
से वह (सत् कहा गया है ।
नहीं है । क्योकि वायु के अन्दर स्थित सुगन्ध या सौरभ का तो अन्य पुरुष भी अपनी प्राण आदि
इन्द्रियों के द्वारा अनुभव करते हैं, परन्तु यह संसार की सृष्टि तो जिस पुरुष के मन में उदित होती
है वही इसका ऐसे अनुभव करता है, जैसे मनोराज्य के पदार्थ का मनोराज्य साक्षी द्वारा या अपने
स्वप्न का स्वप्नद्रष्टा पुरुष स्वयं अनुभव करता है