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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 13, Verse 5

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 13, verse 5 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 13 · श्लोक 5

संस्कृत श्लोक

अत्रैवोदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् । यद्वृत्तं देवराजस्य त्रसरेणूदरे पुरा ॥ ५ ॥

हिन्दी अर्थ

पूर्वसिद्ध देश ओर काल की अपेक्षा न रखनेवाले तथा दूसरे के अनुभव में न आने से परम सौम्यरूप इसी विषय का एक बहुत पुराना इतिहास विद्वान लोग उदाहरणरूप में कहा करते हैं जो कि त्रसरेणु के उदर में बहुत दिन पहले इन्द्र को अनुभूत हुआ था