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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 134, Verses 27–29

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 134, verses 27–29 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 134 · श्लोक 27-29

संस्कृत श्लोक

मांसचर्वणसंरम्भप्रोद्यच्छवशवस्वनम् । लतास्थिखण्डनोड्डीनबृहत्कटकटारवम् ॥ २७ ॥ भूतसंघट्टविश्लेषवशाद्भीषणनिःस्वनम् । हिमवद्विन्ध्यशैलाद्रिप्रमाणास्थ्यचलावृतम् ॥ २८ ॥ देवीमुखानलज्वालापक्वमांसाक्तभूतलम् । रक्तसीकरनीहारसिन्दूरितककुब्गणम् ॥ २९ ॥

हिन्दी अर्थ

आकाशचारी सिद्ध, साध्य, अप्सराएँ, दैत्य, गन्धर्व, नाग, किन्नर, ऋषि, मुनि, षोडष मातर, यज्ञ, पितर देवता आदि आ गये । उन सबकी वेष-भूषा आकाशोत्पन्न थी । उन आकाशचारी सिद्ध आदि ने भक्ति से सिर नवाकर, शरीर झुकाकर रक्षा करने में समर्थ सर्वेश्वरी कालरात्रि देवी की स्तुति की