Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 135, Verses 46–47
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 135, verses 46–47 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 135 · श्लोक 46,47
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हिन्दी अर्थ
रुधिर ने हिम से सम्पादित शुक्लता के प्रति मानों द्रेषवश उसको नष्ट करने के लिए
हिमालय के ऊँचे स्वच्छ विशाल भूभागो को अपने कीचड़ से शीघ्र लथपथ कर रग डाला । क्रौंचद्वीप
में क्रौचनामक पर्वतपर जो विशाल कल्पवृक्ष था, जिसकी शाखाएँ ब्रह्मलोक तक फैली हुई थीं,
उसका भी चूरा-चूरा हो गया है