Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 135, Verse 48
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 135, verse 48 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 135 · श्लोक 48
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हिन्दी अर्थ
हे कल्पवृक्ष, लक्ष्मी, चन्द्रमा ओर अमृत को पैदा
करनेवाले, हे क्षीरसागर, हे दधिसागर, जिसके कि नवनीत से भरे हुए पर्वतो पर वेलावन उगा हे,
जिसके तीरस्थित नारियल के वृक्षों की बहुतायतवाले सुन्दर दर्शनीय पर्वतपर योगेश्वरिर्योँ निवास
करती हैं, ऐसे हे मधुसागर आप सब शोचनीय हैं आप लोग इस समय कहाँ चले गये, अथवा
स्फटिक आदि रत्नशिलाओं से देवांगनाओं ओर दिशाओं की दर्पणता को कहाँ प्राप्त हुए ?