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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 135, Verses 49–55

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 135, verses 49–55 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 135 · श्लोक 49-55

इस समूह का संस्कृत श्लोक-संरेखण अभी परिष्कृत किया जा रहा है; नीचे इसका हिन्दी अर्थ दिया गया है।

हिन्दी अर्थ

हे क्रौचद्रीप, जिसमें कल्पवृक्ष ओर निर्मल कांचनलताओं से निरवच्छिन्न घनिष्ट सम्बन्ध रखनेवाला क्रौंचाचल है, हे पुष्कर द्वीप, जिसका चौगिर्द ब्रह्माजी के वाहनभूत हंसों ओर नलिनियों से ठसाठस भरा है ओर जो कदम्ब के वनों की गुफाओं में विश्राम करनेवाले विद्याधरियों की रतिक्रीडाओं के जानकार नागरिकों ओर देवताओं का अड्डा है, तुम दोनों यहाँ से कहाँ चले गये ? स्वादुजलवाले समुद्र के तथा उसके वनों के, जो कि उग्र ताप को हटानेवाले तथा पुष्पों से आच्छन्न हैं ओर पृथ्वी को पवित्र करनेवाले हैं, गोमेध द्वीप, उसके कल्पवृक्षो के ओर वहाँ की सुवर्णलताओं के तथा उनसे सुन्दर गुफाओं के ओर कल्पवृक्षो के वनों से वेष्टित तथा कल्पवृक्षो के फूलों से सफेद शाकद्वीप के साथ उसके पर्वतो के स्मरण से ही मनुष्यो को स्वर्ग सुखप्रद पुण्य होता है जिनकी दसों दिशाएँ मन्द-मन्द वायु के हिलोरों से चंचल पत्तोवाली लताओं से वेष्टित कल्पवृक्षो से लहलहाती थीं वे सबके सब वन हाय ध्वस्त हो गये मेरी समझ में नहीं आता अब हमारे सदृश लोग कैसे विश्राम लेगे । इक्षुसागर के किनारे मिश्री की चट्टानवाले पहाड़ों से विभूषित पृथ्वीपर उन घने जंगलों को तथा उन अतिमधुर मोदकं को फिर कब देखेंगे ? खांड के बने हुए खिलौनों को भी कब देखेंगे ? ताड़ ओर तमालो के वनों से युक्त उस पर्वत के कदम्ब ओर कल्पवृक्ष से शीतल सुवर्णमय गृहो में बैठकर पहले अनेक बार अनुभूत चन्दनलिप्तसर्वागिवाली सुन्दरियों का (या चन्दनलतारूपी सुन्दरियों का) नृत्य कब देखेंगे ? हा, जम्बूद्वीपवर्ती जम्बूवृक्ष के हाथी के बराबर तथा जाम्बूनद सुवर्ण की उत्पत्ति के हेतु होने से अति प्रसिद्ध अग्रफल स्मरणीय हो गये हैं उन्हीं फलों के रससे बनी नदी को यह जम्बूद्रीपरूप पृथ्वी धारण करती है, अन्यान्य द्वीप और समुद्र उसकी मेखला रूप है । कुकुरमुत्ता (एक प्रकार की बदबूदार वनस्पति, मशरूम) से चारों ओर भरे हुए पहाड़ों की गुफाओं मेँ मदिरा मद से मतवाली स्त्रियों द्वारा किये गये संगीत नृत्य की चहलपहलवाले सुरासागर के तीरका स्मरण कर प्रातःकाल में जैसे कमल की पँखुरियाँ दर दर एक के बाद एक विदीर्ण होती है तथा जैसे इस समय पृथ्वी विदीर्ण हुई हे वैसे ही मेरा हृदय विदीर्ण होता हे