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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 137, Verses 1–2

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 137, verses 1–2 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 137 · श्लोक 1,2

संस्कृत श्लोक

व्याध उवाच । एवं चेत्तन्मुने ब्रूहि कीदृग्दुःखपरिक्षये । न कर्कशो न च मृदुर्व्यवहारक्रमो भवेत् ॥ १ ॥ मुनिरुवाच । इदानीमेव संत्यज्य धनुषा सह सायकान् । मौनमाचारमाश्रित्य शान्तदुःखमिहोष्यताम् ॥ २ ॥

हिन्दी अर्थ

भास ने कहा : राजन्‌, इसके बाद तोते के पंखों की जड के कोनेपर बैठे हुए देवाधिदेव भगवान्‌ अग्नि से मैंने यह पूछा, सुनिये : हे भगवन्‌, हे सकल यज्ञो के ईश्वर, हे स्वाहादेवी के अधिपति, हे अग्निदेव, जिसका इस समय “शव” नाम पड़ा है वह पहले किस कारण से हुआ ?

सर्ग सन्दर्भ

एक सौ पैंतीसवाँ सर्ग समाप्त एक सौ छत्तीसवाँ सर्ग भास के पूछने पर अग्नि द्वारा आदि से लेकर शव के वृत्तान्त का उसकी असुर, मच्छर, मृग ओर व्याध योनियं का - वर्णन |