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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 138, Verse 52

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 138, verse 52 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 138 · श्लोक 52

इस समूह का संस्कृत श्लोक-संरेखण अभी परिष्कृत किया जा रहा है; नीचे इसका हिन्दी अर्थ दिया गया है।

हिन्दी अर्थ

सुषुप्ति में चित्त की व्याप्ति न होने से चित्‌ की अभिव्यक्ति न होनेपर घट आदि के समान जडता की आशंका कर विशेषरूप से अहन्तारूप से विदित न होनेपर भी नख. केश आदि के समान सामान्यतः विदित होने से विदितअविदितात्मक उक्त सुषुप्ति जो कि जड़ भी है ओर जड़ नहीं भी है, चेतनात्मक सुषुप्ति साक्षी में स्फुरित होती है, ऐसा कहते है । जैसे इस शरीर में विशेषतः अहन्तारूप से, अविदित होने से सामान्यतः विदित होने से विदितअविदितस्वरूप जड ओर अजड नख, केश आदि इस शरीर में स्फुरित होते हैँ वैसे ही चेतनरूप साक्षी में सुषुप्ति स्फुरित होती हे