Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 139, Verse 30
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 139, verse 30 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 139 · श्लोक 30
संस्कृत श्लोक
बृहत्कलकलारावं जेतुमब्धिमिवोद्यतम् ।
अतिक्षुभितवास्तव्यमनपेक्षितपुत्रकम् ॥ ३० ॥
हिन्दी अर्थ
सर्वज्ञ होने के कारण उक्त चिन्मात्र ने मानसिक पीड़ा से शून्य अपने शुद्ध बुद्ध स्वरूप का
त्याग किये बिना ही (८) स्व में मनस्त्व का अध्यारोप किया