Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 139, Verse 31
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 139, verse 31 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 139 · श्लोक 31
संस्कृत श्लोक
आवर्ततरलाढ्याभिर्वृत्तिभिर्व्यूढमाकुलम् ।
साक्रन्दोरस्ताडनोत्कजनजम्बालभीषणम् ॥ ३१ ॥
हिन्दी अर्थ
मन से उसने जो अपने संचरण
की कल्पना की, हे श्रेष्ठतम वेदज्ञ, उसे आप प्राणवायु जानिये