Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 141, Verses 3–4
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 141, verses 3–4 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 141 · श्लोक 3,4
संस्कृत श्लोक
तं दवाग्निमहं यावत्तत्त्ववित्त्यादखिन्नधीः ।
विचारयाम्यखिन्नात्मा मारुतस्तावदाययौ ॥ ३ ॥
सीत्कारमतिगम्भीरं दधन्मेघरवोपमम् ।
जगत्पदार्थैरावृत्तैरुह्यमानैः परावृतः ॥ ४ ॥
हिन्दी अर्थ
क्रमिक प्रलय में योग द्वारा भूत और भावी पदार्थो के पयालोचनका अवसर रहता है, किन्तु
आकस्मिक प्रलय में तो मुझे इसका मौका ही नहीं मिला, यों उत्तर देने के लिए प्रलय द्विविध होता है,
ऐसा कहते हैं।
कभी कल्पान्त में क्रमशः नाश होता है, कभी सातों समुद्रों की सहसा एकाकाररूप विकृति हो
जाने से अकस्मात् विनाश होता है । उक्त जल जब इस प्रकार झटपट विकृत हुआ, तब तो जबतक
ब्रह्माजी से निवेदन करने के लिए देवगणों ने ब्रह्माजी के पास जाना चाहा, इतने में ही उन्हे जलराशि
ने बहा डाला। जिस सहसा हुए प्रलय के विषय में देवता भी चूक जाते हैं उसके विषय में मेरा चूकना
कौन बड़ी बात है