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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 141, Verses 5–6

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 141, verses 5–6 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 141 · श्लोक 5,6

संस्कृत श्लोक

बृहद्भिर्घुंघुमावेगैर्वने द्विगुणिताम्बुदः । सूर्यैरावृत्तिभिर्व्यूढैर्विमिश्रालातचक्रकः ॥ ५ ॥ ज्वालासंध्याभ्रनिवहैर्वृहदग्निनदीशतः । शैलद्विगुणभूखण्डदानवामरपत्तनः ॥ ६ ॥

हिन्दी अर्थ

अथवा काल की प्रबलतावश उस समय मेरी ध्यान-धारणा फुरित नहीं हुई, ऐसा कहते हैं। हे वनाधिपति व्याध, यह काल सर्वविनाशक है, किसी को भी नहीं छोडता । जिस समय में जो अवश्यम्भावी होता है उस समय में वह हो कर ही रहता है चाहे कोटि उपाय क्यो न किए जाय । विनाश का समय आनेपर महान्‌ लोगों के भी बल, बुद्धि और तेज सर्वत्र सर्वथा विपरीत हो जाते हैं