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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 141, Verse 7

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 141, verse 7 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 141 · श्लोक 7

संस्कृत श्लोक

भूतैर्द्विगुणपात्रौघो भ्रान्तैरम्बरकुक्षिषु । दग्धादग्धाभिरप्यर्धदग्धाभिरितरेतरम् ॥ ७ ॥

हिन्दी अर्थ

दूसरी बात यह भी है कि स्वप्न में अन्य के चित्त का अनुगमन करते मैंने यह सब देखा था, स्वप्न में तो महात्माओं का भी विवेक कुण्ठित हो जाता है यह सर्वविदित है, यों परिहारान्तर कहते हैं। हे वनाधीश, मैंने आपसे यह स्वप्न में देखा वृत्तान्त कहा है। स्वप्न में क्या संभव नहीं है ? क्या यह बात सब लोगों को विदित नहीं है ?