Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 145, Verse 20
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 145, verse 20 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 145 · श्लोक 20
संस्कृत श्लोक
उत्फुल्लश्वेतनलिनीनिभा नरपतेः सभाः ।
चारुचामरभृङ्गारवितानकशतावृताः ॥ २० ॥
हिन्दी अर्थ
उनका
उक्त कथन ठीक नहीं है, कारण कि जैसे वायु में चारों ओर स्पन्द स्वतः स्थित है वैसे ही चित्त में
स्वप्नरूप पदार्थ स्वतः ही स्थित है । वे स्वतः स्वप्न के आकार में ढलते हैं, अतः उनमें
जाग्रत्संस्कारकर्तृत्व कैसा ?