Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 147, Verse 20
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 147, verse 20 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 147 · श्लोक 20
संस्कृत श्लोक
बिम्बं तत्तदुपादत्ते यद्यदग्रेऽवतिष्ठति ।
यथादर्शश्चिदादर्शस्तथैवायं स्वभावतः ॥ २० ॥
हिन्दी अर्थ
तब “अस्ति” (है) “नास्ति (नहीं है) इस लोकप्रसिद्ध व्यवहार का कौन विषय है ? इस प्रकार
उक्त व्यवहार के विषय को दशति हुए द्वितीय पक्ष में कहते है ।
जो अनिर्वचनीय मायाशक्ति है वही अस्ति" इस लोकव्यवहार का विषय है, चूँकि ब्रह्म मायाशबल
होने से अज्ञानियों की दृष्टि में मायात्मक हे । जैसे जैसे मायाशक्ति उत्कर्ष को प्राप्त होती है वैसे ही
सर्वशक्ति घटित स्वरूपवाला वह तदात्मक कहा जाता है