Guru's AddaGuru's Adda

Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 147, Verse 21

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 147, verse 21 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 147 · श्लोक 21

संस्कृत श्लोक

यस्तु चिन्मात्रगगनं सर्वमित्येव बोधवान् । द्वैतेन बोध्यते नेह सोऽङ्ग तिष्ठति केवलः ॥ २१ ॥

हिन्दी अर्थ

तत्त्वज्ञानी तो सदा तुरीय पद में प्रतिष्ठित रहते है । अतएव उनकी जाग्रत्‌ आदि अवस्थाएँ ही नहीं हैं, विधि, प्रतिषेध तो दूर रहे, ऐसा कहते है। तत्त्वज्ञान सम्पन्न विद्वानों की जाग्रत्‌, स्वप्न, सुषुप्ति आदि अवस्थाएँ नहीं हैं, उनके लिए सब कुछ यथास्थित ब्रह्म ही हे