Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 150, Verse 15
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 150, verse 15 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 150 · श्लोक 15
संस्कृत श्लोक
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हिन्दी अर्थ
यह जगत् निराकार, नामरहित, आदिरहित, कल्पनाशून्य
चिन्मात्ररूप काँच की चमक रूप से (जगमग रूप से) स्थित है