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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 150, Verse 18

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 150, verse 18 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 150 · श्लोक 18

संस्कृत श्लोक

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हिन्दी अर्थ

समष्टि व्यष्टिभाव की कल्पना ही हमारे चित्‌ के अधीन है, ऐसा कहते हैं। जिस प्राणी के हृदयवर्ती ओज में हम लोग स्थित हैं वह इन प्रजाओं का यानी हमारा विराट आत्मा है। वह हमारी चित्‌ की कल्पना से ही विराट्भाव को प्राप्त हुआ है । अपनी कल्पना से तो औरों के समान व्यष्टि ही है