Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 150, Verse 25
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 150, verse 25 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 150 · श्लोक 25
संस्कृत श्लोक
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हिन्दी अर्थ
केवल सहेतुक मानने से ही स्वप्न में घड़े आदि की सहेतुकता नहीं हो जाती इसलिए निर्हेतुक
जगत् की सिद्धि न होने से परमार्थतः चिन्मात्र ब्रह्म ही है, ऐसा कहते हैं।
स्वप्न के नगर में सहकारी कारण आदि कोई कारण नहीं है, इसलिए वह (स्वप्ननगर) आदि अजर
चेतन मंगलमय परम ब्रह्म ही है