Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 151, Verse 20
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 151, verse 20 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 151 · श्लोक 20
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हिन्दी अर्थ
जगद्भ्रान्ति तो अविद्या होने से विद्यावृत्ति से ही उच्छिन्न हो ही गई, अतः वह इस समय त्याज्य
नहीं है, ऐसा कहते हैं।
यह जगद्भ्रम मिथ्यारूप अविद्या ही है इससे क्या हानि है । इस असद्भ्ान्ति का विद्यावृत्तिरूप
भ्रान्ति से मैं अभी त्याग कर ही चुका हूँ