Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 151, Verse 21
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 151, verse 21 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 151 · श्लोक 21
इस समूह का संस्कृत श्लोक-संरेखण अभी परिष्कृत किया जा रहा है; नीचे इसका हिन्दी अर्थ दिया गया है।
हिन्दी अर्थ
यहाँ ये उपदेशक मुनि महाराज भी केवल भ्रान्तिरूपही
हैं। ये उपदेश देनेवाले मुनिजी मुझ शिष्य की तरह ब्रह्मरूप ही हैं, यानी ब्रह्म ही गुरु, शिष्यरूप से
प्रतीत होता है, अतः यहाँ त्याग करने योग्य अन्य वस्तु नहीं है। यह सब दृश्य दिन में देखे गये पुरुषाकार
मेघ के समान क्षणभंगुर हे