Guru's AddaGuru's Adda

Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 151, Verses 46–47

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 151, verses 46–47 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 151 · श्लोक 46,47

इस समूह का संस्कृत श्लोक-संरेखण अभी परिष्कृत किया जा रहा है; नीचे इसका हिन्दी अर्थ दिया गया है।

हिन्दी अर्थ

दूर देशों में स्थित लोगों ने उक्त अग्नि को यह स्थिर बिजली है ऐसा देखा वह आकाश को गलाए हुए सोने के रससे लीपे हुए फर्शसा दिखलाती थी। निकल रही चिनगारियों से आकाश के तारों को दुगुना बना रही थी और उन्हीं चिनगारियों से आकाश में वक्षस्थल में स्थित ज्वालारूपी बालवनिता के नयनों को आनन्द देनेवाले कटाक्षों से आनन्द देती थी