Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 155, Verse 10
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 155, verse 10 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 155 · श्लोक 10
संस्कृत श्लोक
तस्मिञ्जगति तैर्भावैस्तैः समं निवसन्सदा ।
बहून्यब्दसहस्राणि चकार सुमहत्तपः ॥ १० ॥
हिन्दी अर्थ
स्पष्ट रीति से प्रतीत हो रहे मनुष्य, देवता, पशु-पक्षी, पर्वत, पेड़ आदि की स्वप्नतुल्यता अत्यन्त
असम्भव हैं इस बात को व्यंग्य से सूचित करता हुआ लुब्धक कहता है ।
व्याध ने कहा : हे मुनिजी, यदि ऐसी बात है तो मैं, आप और सब देवता सबके सब आपस में
स्वप्नपुरुष होने से सत् होते हुए भी असत्मय हो जायेंगे