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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 155, Verses 7–9

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 155, verses 7–9 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 155 · श्लोक 7-9

संस्कृत श्लोक

भावाभावात्मनो नित्यमस्यान्ते स्थीयते सुखम् । तस्मादाकाशमप्यस्ति यत्र नो तत्र याम्यहम् ॥ ७ ॥ इति निर्णीय हृदये मूर्ख एव बभूव सः । गतं तादृशमप्युक्तं विनाभ्यासेन भस्मनि ॥ ८ ॥ ततस्ततः प्रभृत्येव तेनैव मुनिभिः सह । लुब्धकत्वं परित्यज्य तपश्चरितुमुद्यतः ॥ ९ ॥

हिन्दी अर्थ

अनुसार मैं कह चुका हूँ । हे लुब्धक, इन सबको मिथ्या जानकर तुम शान्त होओगे, क्योकि यह चिदाकाशरूपिणी आत्मसत्ता शान्त ही है अशान्त नहीं हे । अथवा आत्यन्तिक दृश्यशान्ति ही आत्मशान्ति हे