Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 156, Verses 28–42
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 156, verses 28–42 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 156 · श्लोक 28-31
संस्कृत श्लोक
सिन्धुर्वदिष्यति ।
न प्रार्थिता मया कस्मादनेनैषा सरस्वती ।
संविच्छुद्धा मया कस्मात्प्रार्थिता नेह मुक्तये ॥ २८ ॥
मदाशयगताप्येषा ज्ञप्तिं दत्त्वा सरस्वती ।
मन्मोक्षाय किमित्यङ्ग सद्रूपापि न चेष्टते ॥ २९ ॥
मन्त्री वदिष्यति ।
अशुभः प्राक्तनोऽभ्यासस्तवास्ति रिपुघातिनः ।
तेनैषा मुक्तये नत्वा त्वया न प्रार्थिता विभो ॥ ३० ॥
यच्चित्तस्तन्मयो जन्तुर्भवतीत्याजगत्स्थितेः ।
आबालमेव संसिद्धं कर्तुं शक्नोति कोऽन्यथा ॥ ३१ ॥
यदेव येनामलयामलात्म संवेद्यतेऽभ्यासमयं विदान्तः ।
सर्वोपमर्देन तदेव सोऽङ्ग सदस्त्वसद्वास्तु भवत्यविघ्नम् ॥ ३२ ॥
हिन्दी अर्थ
उसके बाद मुझसे पूछकर नमस्कार कर उसी समय दिव्यशरीरधारी तुम चित्त में स्थित
त्रिलोक का अन्त देखने की उत्कट इच्छा से मेरे आश्रम से आकाश में चढ़े हुए दूसरे बड़वानल-से उड़
जाओगे । तदनन्तर दृश्य जगत् तथा आकाश के अन्त तक पहुँचने के लिए गरुड के सदृश वेग से दौड़
रहा तुम्हारा शरीर, जो कि उन्मत्त प्रलयसागर की तरह अपार आकाश की निरवकाशता को पूर्ण
करनेवाला होगा, नदियों के अन्त की तरह त्रैलोक्य के अन्त में निरन्तर बढ़ता ही जायेगा